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सरेंडर करो वरना गोली मार देंगे! 46 साल पहले जब नीतीश पर सिपाही ने तान दी बंदूक

पटना : इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये के खिलाफ उठे तत्कालीन नेताओं के कदम ने लोकतंत्र के इतिहास में एक गौरवमयी क्षण जोड़ दिया था। बिहार के संदर्भ में देखे तो जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल के दौरान दूसरी आजादी का बिगुल फूंका था। उस दौर में जॉर्ज फर्नांडिस, राम विलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, शिवानंद तिवारी, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी और अरुण सिन्हा जैसे नेता आगे आए। इनकी आंदोलन की आक्रामकता इनके जेल जाने का कारण बनी। जेल से जब बाहर आए तो इंदिरा गांधी की तानाशाही सरकार उलट गई। 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई। देश में जनता पार्टी की सरकार बनी। आपातकाल के इन रणनीतिकारों का तब का क्या अनुभव रहा? जानिए उनकी ही जुबानी।

जब नीतीश की गिरफ्तारी बंदूक की नोक पर हुई

आपातकाल के दौरान मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गिरफ्तारी बंदूक की नोक पर हुई थी। ये खुलासा खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की। मौका था विधान परिषद का सत्र का। दरअसल, गृह मामलों के प्रभारी मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव कांग्रेस सदस्य प्रेम चंद्र मिश्रा के एक तारांकित प्रश्न का जवाब दे रहे थे। प्रेमचंद्र मिश्रा कह रहे थे कि प्रदर्शनकारियों से निपटने में बिहार पुलिस नियमावली का उल्लंघन किया गया है। इसके दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सरकार से कार्रवाई के लिए दबाव बना रहे थे। तभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हस्तक्षेप करते कहा कि जेपी आंदोलन के दौरान एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में उन्हें इस तरह की कार्रवाई से गुजरना पड़ा था। तब पुलिस ने उनकी तरफ बंदूक तान दी। मैंने तब अपनी गिरफ्तारी दी थी।

काला धब्बा था इमरजेंसी: शिवानंद तिवारी

जेपी आंदोलन के नायकों में से एक समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि जो हुआ वो अच्छा तो नहीं हुआ। काले धब्बे से कम नहीं था आपातकाल। लोकतंत्र में ऐसी हरकत की इजाजत नहीं होती। जयप्रकाश नारायण उस खास घड़ी में प्रेरणा बनकर सामने आए। इस अंधेरे में उम्मीद बन कर सामने आए। युवाओं को आगे आने का आह्वान किया। उनके इस ऐलान का पूरे देश में व्यापक असर पड़ा। युवा छात्र सड़कों पर निकल पड़े। पुलिस बल से झड़प हुई। गिरफ्तारी हुई। उनमें से एक मैं भी था।

शिवानंद तिवारी ने कहा कि उनको पटना के फुलवारी शरीफ जेल में बंद किया गया। इस दौरान महसूस किया कि इमरजेंसी का व्यापक विरोध नहीं हो पाया था। अगर इमरजेंसी का चौतरफा विरोध होता तो शायद इतने दिनों तक इमरजेंसी नहीं लगती। कहीं ना कहीं इंदिरा गांधी को अपनी गलती का एहसास था। उनके साथ जेपी समेत कई बड़े नेताओं को जब जेल में डाला गया तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी दबाव बनाया गया। जिसका प्रभाव ये हुआ कि आखिरकार इंदिरा गांधी को इमरजेंसी हटाकर फिर से चुनाव की घोषणा करनी पड़ी।

इंदिरा गांधी ने कोर्ट का अपमान किया: अरुण सिन्हा

वर्तमान बीजेपी विधायक अरुण कुमार सिन्हा इमरजेंसी के समय को याद कर विह्वल हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि तब मैं सिवान जेल में बंद था। आपातकाल की घोषणा सत्ता के लोभ में लाया गया था। इंदिरा गांधी ने कोर्ट का भी अपमान किया था। कोर्ट के फैसले के मुताबिक उन्हें पीएम पद से हटना चाहिए था, मगर कुर्सी प्रेम दिखाते आनन-फानन इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोप दी। इमरजेंसी के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता खत्म हो गई। लोगों को कई तरह से प्रताड़ित किया गया। जबरदस्ती हर धर्म के लोगों को नसबंदी कराने को मजबूर किया गया।

अरुण सिन्हा ने कहा कि वो सिवान जेल में महाकवि नागार्जुन के साथ बंद थे। उस दौरान नागार्जुन ने इंदिरा गांधी के खिलाफ कई कविताएं लिखी। हर ओर भय व्याप्त था। सबको लग रहा था कि अब देश में सैनिक शासन हो जाएगा। लोकतंत्र खत्म होने की कगार पर था। लेकिन हमने उम्मीद नहीं छोड़ी। उस समय सुशील कुमार मोदी, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, अश्विनी चौबे के साथ सभी प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। केवल जॉर्ज फर्नांडीज अंडर ग्राउंड हो गए थे।

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