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क्या लालू ने खोज दिया 2024 का दूल्हा? इशारों में कुछ यूं बाजी पलटते रहे हैं RJD सुप्रीमो

पटना: विपक्षी एकता की बैठक में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद एक सधे हुए राजनेता की तरह नजर आए। इस बैठक में उनका वो मूल रूप भी दिखा, जो खिलंदड़ अंदाज में सामान्य बात होती है। वो अपने एक विशेष अर्थ के साथ भी प्रकट होती है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अक्सर साधारण अंदाज में बड़ी लड़ाई का हल लालू प्रसाद निकाल लेते हैं।

दूल्हा बनो राहुल… बैठक में सवाल तो खड़े हुए?

बैठक में लालू प्रसाद ने भले एक पारिवारिक अंदाज में ये कह डाला कि राहुल गांधी आप दूल्हा बन जाओ और हम सब बाराती बन कर चलेंगे। मगर क्या लालू यादव का निहितार्थ सिर्फ इतना था? राजनीतिक गलियारों में लालू प्रसाद के इस अंदाज ने एक तरह से राहुल गांधी को सबके सामने प्रधानमंत्री का एक चेहरा प्रोजेक्ट कर डाला। वो भी इस अंदाज में कि किसी दल को खराब लगेगा तो उसे ये कह कर समझाया जाएगा कि शादी के लिए कह रहे थे भाई। लेकिन इतना तो तय है कि लालू प्रसाद के इस अंदाज ने शिमला में आयोजित बैठक के लिए उन दलों को एक प्रश्न तो दे डाला कि आखिर पीएम का चेहरा कौन होगा?

सूर्यगढ़ा में जब लालू ने बजवा दिया था नगाड़ा

एक कहावत है कि खग की भाषा खग ही जाने। तो लालू प्रसाद के वोटर भी उनकी भाषा समझते हैं। वर्ष 1990 का विधानसभा चुनाव था। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रहे थे। सूर्यगढ़ा विधानसभा से सीपीआई के प्रमोद शर्मा मैदान में थे। लालू अपने अपने गठबंधन उम्मीदवार के प्रचार में गए थे। गठबंधन के उम्मीदवार के लिए वोट भी मांगा। मगर लालू प्रसाद के अंतिम वाक्य ने करिश्मा कर दिया। हुआ ये कि चलते-चलते भीड़ को संबोधित करते ये कह डाला कि जाओ जाकर नगाड़ा बजा दो। बस क्या था नगाड़ा छाप पर चुनाव लड़ रहे प्रह्लाद यादव की तो गाड़ी चल निकली। वो चुनाव भी जीत गए। बाद में पता चला कि नगाड़ा छाप पर चुनाव लड़ रहे प्रह्लाद यादव उनके ही (लालू यादव) सेटिंग वाले उम्मीदवार थे।

विपक्षी एकता को लेकर सवाल तो कुछ और भी?

हालंकि, विपक्षी एकता को लेकर ये लगातार कहा जा रहा था कि 18 दल आएंगे। मगर बैठक के दिन 15 ही दल आए। राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने सहमति पत्र भेजकर आने से मना कर दिया। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पोते और अजीत चौधरी के बेटे जयंत ने नहीं आने की वजह दूसरी व्यस्तताएं बताईं। जबकि हकीकत ये है कि इसी आशंका के कारण जदयू ने इनके स्वागत में पोस्टर नहीं लगवाए थे। भारत राष्ट्र समिति के संस्थापक और तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर को लेकर भी यही डर था। इसलिए गुरुवार सुबह से स्वागत के पोस्टर नजर नहीं आए। शिरोमणी अकाली दल के आने की भी बात थी। लेकिन इस दल ने भी विपक्षी एकता से खुद को दूर ही रखा।

बहरहाल, इन तीन दलों के न आने से भी बड़ा प्रश्न राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद का है, जिन्होंने हल्के अंदाज में राहुल गांधी का नाम अपरोक्ष रूप से प्रस्तावित कर डाला। राजनीतिज्ञों का मानना है कि शिमला बैठक का मूल प्रश्न ये होने जा रहा है कि क्या किसी चेहरे को लेकर चुनाव लडेंगे या बगैर चेहरे के? अगर चेहरे के साथ लड़ेंगे तो क्या चेहरा राहुल गांधी होंगे?

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