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गोरखा सैनिकों के चीनी शामिल होने का खतरा, पीएम मोदी से आखिर क्‍या चाहते हैं नेपाली प्रधानमंत्री प्रचंड, समझें

काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्‍प कमल दहल प्रचंड पिछले दिनों पीएम पद संभालने के बाद पहली बार भारत यात्रा पर नई दिल्‍ली पहुंचे। प्रचंड ने अपने भारतीय समकक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी की। माना जा रहा है कि इसी दौरान उन्‍होंने भारतीय सेना में होने वाली गोरखा सैनिकों की भर्ती के लिए बेहतर शर्तों को भी पीएम मोदी के सामने रखा है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रचंड ने भारत के सामने एक ऐसी स्थिति पेश कर दी है जो किसी परीक्षा से कम नहीं है। प्रचंड जानते हैं कि नेपाल पर चीन के बढ़ते प्रभाव से भारत परेशान है और प्रचंड ने इसी बात का फायदा उठाने की कोशिश की है।

क्‍यों नाराज है नेपाल
पिछले साल भारत सरकार ने गोरखा सैनिकों के लंबी अवधि वाले रोजगार को छोटे अनुबंध वाले बिना पेंशन के टेन्‍योर में बदल दिया था। इस वजह से नेपाल ने 200 साल भर्ती प्रक्रिया को स्‍पष्‍टता नहीं होने तक के लिए रोक दिया था। गोरखा सैनिकों को उनकी बहादुरी और सैन्य कौशल के लिए जाना जाता है। गोरखा कबीले के योद्धाओं को भारतीय सेना में भेजना नेपाल के लिए हमेशा से राजस्व का एक बड़ा स्‍त्रोत रहा है। मगर नेपाल छोटे अनुबंधों से नाराज है। वहीं भारत सरकार के कुछ हिस्‍सों में इस बात को लेकर चिंता है कि यह फैसला नेपाल को चीन के करीब कर सकता है जो उसे कई विकास परियोजनाओं का लालच दे रहा है।

भारतीय सेना का अभिन्‍न हिस्‍सा गोरखा
इस पूरे मामले से वाकिफ लोगों के मुताबिक, दहल ने जब पीएम मोदी से बात की तो उन्‍होंने गोरखा भर्ती का मुद्दा प्रमुख तौर पर उठाया। सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में भारत और नेपाल कुछ गोरखा सैनिकों को अपने भारतीय समकक्षों की तरह सैन्य सेवा खत्‍म होने के बाद उन्‍हें पुलिस और अर्धसैनिक संगठनों में शामिल करने पर सहमत हो सकते हैं। भारतीय सेना की 44 गोरखा बटालियनों में करीब 60 फीसदी सैनिक नेपाली हैं। ये बटालियन पाकिस्तान और चीन के साथ भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर रोटेशन के तहत तैनात होती हैं। इस वजह से ही गोरखा रेजीमेंट भारतीय सेना का ए‍क अभिन्‍न अंग बन जाती है।

क्‍या है गोरखा का इतिहास

गोरखा सैनिक सन् 1815 से उपमहाद्वीप की सेना का हिस्सा रहे हैं। उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य ने एक शांति संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद से ही गोरखा लड़ाकों की भर्ती का दरवाजा खुल गया था। सन् 1947 में आजादी के बाद लंदन, भारत और नेपाल के बीच एक समझौते ने भारत और ब्रिटेन को अपनी सेनाओं में गोरखा लड़ाकों की भर्ती जारी रखने की अनुमति दी। सेना की बटालियन भी भारतीय गोरखाओं से बनी हैं और वो भी अग्निपथ नामक भर्ती स्‍कीम में बदलाव से नाखुश हैं।चीन की लालची नजरें
अग्निपथ स्‍कीम की वजह से साल 2023 में एक भी नेपाली गोरखा, भारतीय सेना में शामिल नहीं हुआ। वहीं चीन इस पूरे मुद्दे में फायदा उठाने की ताकमें है। चीन काफी समय से भारतीय सेना में शामिल होने वाले नेपाली गोरखा की वजह से परेशान था, अब उन्‍हें पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में भर्ती करने के लिए बेचैन है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर चीन को इस मसले का फायदा उठाने से रोकना है तो फिर भारत को इसका कोई हल जल्‍द निकालना होगा।

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