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स्पेलिंग बी प्रतियोगिता में भारतवंशी बच्चों का वर्चस्व, इस साल प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंचे 11 में 10 बच्चे भारतवंशी

पीटीआई, वॉशिंगटनः अमेरिका में स्क्रिप्स नैशनल स्पेलिंग बी (Scripps National Spelling Bee) 2023 प्रतियोगिता में भारतवंशी बच्चों का दबदबा बरकरार रहा। अमेरिकी राज्य फ्लॉरिडा के लार्गो निवासी 14 साल के देव शाह ने 11 अक्षरों वाले ‘सैममोफाइल’ (Psammophile) शब्द की सही स्पेलिंग बताकर इस प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया। ‘सैमोफाइल’ रेतीले क्षेत्रों में पाए जाने वाले पौधे या जीव होते हैं। आ‌ठवीं के छात्र देव ने इस शब्द को लिखने के साथ ही मैरिलैंड के नैशनल हार्बर में गुरुवार रात हुए इस प्रतियोगिता के फाइनल की ट्रोफी और 50 हजार डॉलर का पुरस्कार जीता।

प्रतियोगिता जीतने के बाद शाह ने कहा, यह अद्भुत है…मेरे पैर अब भी कांप रहे हैं। मैंने इस जीत के लिए बीते तीन महीनों में कई त्याग किए। मुझे इसका पछतावा नहीं। मुझे अपने सभी त्यागों का फल मिला है। टॉप पर पहुंचने से पहले उन्होंने bathypitotmeter (बैथीपीटोमीटर), tolsester (टॉलसेस्टर), rommack (रोमैक), एगैग्रस, schistorrhachis (शिस्टोराचिस), poliorcetics (पोलियोरसेटिक्स), Perioeci (पेरियोसी), exhortation (एग्जॉरेशन), cocomat (कोकोमैट) आदि शब्दों की सही स्पेलिंग बताई। फाइनल में देव शाह का मुकाबला वर्जिनिया के अर्लिंगटन की रहने वालीं 14 साल की शैर्लट वॉल्श से हुआ। वह उपविजेता रहीं।

फाइनल में पहुंचे 11 में 10 भारतवंशी थे

95वीं नैशनल बी प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंचे 11 लोगों में 10 भारतवंशी थे। श्रद्धा रचमरेड्डी और सूर्या कापू 15 हजार डॉलर के पुरस्कार के साथ संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर रहे। शाह तीसरी बार इस प्रतियोगिता में शामिल हुए। इससे पहले, वह 2019 और 2021 में शामिल हुए थे। कोविड के कारण 2020 में इस प्रतियोगिता का आयोजन नहीं किया गया था। शाह की जीत पर माता-पिता बेहद भावुक नजर आए। मां ने कहा कि देव शाह चार साल से इसके लिए मेहनत कर रहा था। इस प्रतियोगिता की शुरुआत 2025 में हुई थी।

इस प्रतियोगिता में क्यों छाए भारतवंशी?

ढाई दशक से स्पेलिंग बी प्रतियोगिता में भारतवंशी बच्चों का वर्चस्व है, जबकि अमेरिका में भारतवंशी स्टूडेंट्स की तादाद 1% से भी कम है। फिर भी इस स्पेलिंग कॉम्पिटिशन में क्वॉलिफाई करने वाले 300 बच्चों में से हर साल 20% से ज्यादा भारतवंशी होते हैं। साल 2008 से लगातार भारतवंशी स्टूडेंट्स इसे जीत रहे हैं।

जीत का राज: पहला, भारतीय बच्चों की पढ़ाई मुख्य रूप से अंग्रेजी माध्यम से होती है। दूसरा, रटकर सीखने पर जोर दिया जाता है। पैरंट्स क्वॉलिटी एजुकेशन के साथ अनुशासन पर भी जोर देते हैं। चूंकि, स्पेलिंग बी के विजेता भारतीय मूल के रहे हैं। इसलिए इस प्रतियोगिता को हर साल जीतने का दबाव भी है।

परिवार भी करता है तैयारी? बच्चों को स्पेलिंग बी जिताने के लिए पूरा खानदान लग जाता है। मसलन- पहले के दौर में गुजराती मूल के एक बच्चे को प्रतियोगिता में जिताने के लिए उनके दादा-दादी ने भारत में पूजा रखवाई, मुफ्त खाना खिलाया। एक माता-पिता ने दूसरी भाषाओं से अंग्रेजी में आने वाले शब्दों को सिखाने के लिए फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन टीचर रखे।

फायदा क्या? प्रतियोगिता को रटंत विद्या कह आलोचक उपहास उड़ाते हैं। वहीं, विजेता कहते हैं कि जीत से हमें अनुशासित रहने, किसी मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिली।

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