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पुतिन हो या जिनपिंग या फिर अल्‍बनीज… मीठा-मीठा ही नहीं बोलते, जरूर पड़े तो मुंह पर सुना भी देते हैं PM मोदी

सिडनी/नई दिल्‍ली: विदेशी दौरों पर बेहद नपे-तुले अंदाज में बात रखनी होती है। अगर आप प्रधानमंत्री हों तो आपके हर शब्द के कूटनीतिक मायने निकाले जाते हैं। समझदार को इशारा काफी होता है, इसके बावजूद कभी-कभी साफगोई से बात रखना जरूरी हो जाता है। पीएम नरेंद्र मोदी इसी फलसफे पर चलते हैं। सामने वाला खुद ही समझ जाए तो कहने की क्‍या जरूरत! न समझे तो मुंह पर कहना ही पड़ता है। पीएम मोदी ने ग्लोबल लीडर्स से बातचीत में यह ट्रेंड बरकरार रखा है। फिर चाहे वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को SCO के मंच से सुनाना हो या फिर यूक्रेन पर आक्रमण के लिए रूसी राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन को खरी-खरी कहना… मोदी हिचके नहीं। ऑस्‍ट्रेलिया दौरे पर गए तो वहां के पीएम एंथनी अल्‍बनीज से साफ कहा कि मंदिरों पर हमले स्वीकार्य नहीं। इससे पहले, मोदी ने ऑस्ट्रेलियाई लोगों और अल्‍बनीज की खूब तारीफ की।

ऑस्‍ट्रेलिया में मंदिरों पर हमले, PM ने मुंह पर सुनाया

पीएम मोदी के सम्मान में सिडनी के स्टेडियम में मेगा इवेंट रखा गया था। मंगलवार को मोदी ने वहां जो भाषण दिया, उसमें भी मंदिरों पर हमले का जिक्र किया। बुधवार को अपने समकक्ष एंथनी अल्‍बनीज से द्विपक्षीय बातचीत में यह मुद्दा फिर उठा। एक बयान में पीएम मोदी ने कहा, ‘ऑस्ट्रेलिया में मंदिरों पर होने वाले हमलों और अलगाववादी तत्वों की गतिविधियों के संबंध में हमने पहले भी बात की थी और आज भी बात की है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के सौहार्दपूर्ण रिश्तों को कोई भी तत्व अपने विचारों या एक्शन से आघात पहुंचाए ये हमें स्वीकार्य नहीं है।’

‘संप्रभुता से कोई समझौता नहीं’

ऑस्ट्रेलिया जाने से पहले पीएम मोदी ने पापुआ न्‍यू गिनी और जापान की यात्रा की। जापान के हिरोशिमा में G7 देशों की बैठक में आमंत्रित सदस्य के रूप में हिस्सा लिया। जापान के एक अखबार को दिए इंटरव्यू में पीएम ने कहा कि भारत अपनी संप्रभुता और गरिमा की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है।

G7 शिखर सम्मेलन के एक सत्र में चीन का नाम लिए बिना पीएम ने कहा कि यह जरूरी है कि सभी देश संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून और सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें। यथास्थिति को बदलने की एकतरफा कोशिशों के खिलाफ मिलकर आवाज उठाएं। प्रधानमंत्री की टिप्पणियां पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद की पृष्ठभूमि में आई।

पुतिन को पढ़ाया शांति का पाठ

पीएम मोदी ने रूस-यूक्रेन संघर्ष पर बार-बार कहा है कि संवाद और कूटनीति ही इस संघर्ष के समाधान का एकमात्र रास्ता है। SCO की बैठक में पीएम मोदी ने रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन से दो टूक कहा था कि ‘यह समय यु्द्ध का नहीं है और सभी मुद्दों का समाधान बातचीत से होनी चाहिए।’ इस बयान के बाद पूरी दुनिया में पीएम मोदी की खूब तारीफ हुई। संयुक्‍त राष्‍ट्र में फ्रांस के राष्‍ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी मोदी को सराहा।

यूएन में भारत ने इस मसले पर पहले तटस्‍थ रुख रखा था। मोदी ने बार-बार पुतिन से फोन पर बात की और बातचीत से मसला सुलझाने को कहा।

नाम नहीं लिया पर जिनपिंग, PAK को सुना गए थे पीएम

पिछले साल सितंबर में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों की बैठक हुई। समरकंद में पीएम मोदी ने 4 मिनट 49 सेकंड तक भाषण दिया। उन्होंने चीन का नाम नहीं लिया मगर ड्रैगन को खूब सुनाया। पीएम ने कहा कि भारत SCO देशों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग का समर्थन करता है। पीएम ने यह भी गिनाया कि कैसे भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है।
उसी बैठक में पीएम ने पाकिस्तान पर भी वार किया। पीएम मोदी ने कहा कि SCO को क्षेत्र में लचीली आपूर्ति शृंखला बनाने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए बेहतर संपर्क सुविधा एवं एक-दूसरे को ट्रांजिट का अधिकार देना महत्वपूर्ण होगा। दरअसल, उन्होंने इशारों में अफगानिस्तान को दिए जाने सहायता में पाकिस्तान की रोक का जिक्र कर दिया। पीएम ने अफगानिस्तान को मदद में रोड़ा अटकाने को लेकर पाकिस्तान को खूब सुना डाला।
PM मोदी की लोकप्रियता से बाइडन भी परेशान!

‘UN में सुधार नहीं हुआ तो ये चर्चा का मंच बनकर रह जाएंगे’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद जैसे बड़े वैश्विक संस्थानों में सुधारों की पुरजोर वकालत की है। उन्‍होंने G7 के मंच से कहा कि अगर ऐसे संस्थान मौजूदा विश्व की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं तो ये महज चर्चा का मंच बनकर रह जाएंगे। मोदी ने अचंभा जताया कि यह सोचने की बात है कि हमें शांति और स्थिरता की बातें अलग-अलग मंच पर क्यों करनी पड़ रही हैं? संयुक्त राष्ट्र की शुरुआत ही शांति स्थापित करने की कल्पना से की गई थी। ऐसे में यह आज संघर्ष रोकने में सफल क्यों नहीं होता? आखिर क्यों, संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद की परिभाषा तक मान्य नहीं हो पाई है?

भारत संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मजबूती से वकालत करता रहा है। भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता चाहता है। अभी सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य- अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस हैं, जिन्हें वीटो की ताकत मिली है। सुरक्षा परिषद में 10 अस्थायी सदस्य होते हैं और इनका चयन संयुक्त राष्ट्र महासभा दो साल के लिए करती है।

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