वन विभाग में छोटे कर्मचारियों पर ही आखिर क्यों गिरती गाज

फाइल फोटो लटेरी
भोपाल. विदीशा के लटेरी दक्षिण की एक पंचायत मुस्करा क्षैत्र में 15 हजार पौधे लगाने की जगह 2100 सौ पौधै लगादिऐ मामले में 50 हेक्टेयर के बजाह 37 हेक्टेयर में गड्डे खोदे गये थे जो कि बड़ा भ्रष्टाचार हुआ, इस में वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार में एक रेंजर, एक डिप्टी रेंजर एवं एक नाकेदार को दोषी मानकर निलंबित कर दिया गया है जिनके नाम रेंजर विनोद सिंह, डिप्टी रेंजर रणधीर सिंह मीणा, नाकेदार मनोहर शर्मा है। 24 मई को दैनिक भास्कर में छपी खबर के आधार पर वन विभाग के अधिकारी सकते में आए और आनन-फानन में गुरुवार रात्रि 1:00 बजे के दरमियान वहां के डीएफओ ओंमकार सिंह मर्सकोले कि अचानक नींद खुली और वह तेजगति से जांच करने पहुंचे।
जांच के दौरान गड़बड़ी पाए जाने पर डीएफओ ने तत्काल प्रभाव से 3 वन कर्मचारियों को निलंबित कर दिया अब सवाल ..? यह खड़ा होता है उस समय में कर्यरत एसडीओ पर कृपा तो की ही और एक डीएफओ ने दूसरे डीएफओ को सुरक्षित बचाते हुए तीनों कर्मचारियों को निलंबित करके भ्रष्टाचार पर कार्यवाही करते हुए विराम लगा दिया।
इतने बड़े भ्रष्टाचार के मामले में सीसीए भोपाल की भी गैर जिम्मेदाराना कार्य देखने में आ रहा है, इसकी भी पुष्टि करते हुए 18 लाख रुपए की लागत से 15000 पौधों को लगाए जाने की योजना मैं शामिल सिर्फ यही 3 वन कर्मचारी थे जिनके हस्ताक्षर से लाखों रुपए के बिलो का भुगतान हो गया। ऐसा बिल्कुल भी नहीं हैं इसमें जितने दोषी रेंजर, डिप्टी रेंजर, एवं नाकेदार को माना गया है उतना ही उस समय में कार्यरत डीएफओ एवं एसडीओ दोनों अधिकारी भी दोषी हैं क्योंकि रेंज में किसी भी तरह की योजना पर किए गए कार्य या बिलों के भुगतान का सत्यापन के लिए एसडीओ को उस स्थान का निरीक्षण करना होता है जहां पौधे लगाए गए हैं एसडीओ के सत्यापन के बाद वह फाइल डीएफओ की टेबल पर पहुंचती है यहां से उनकी जिम्मेदारी शुरू होती है उन्हें उस स्थान की जांच करनी होती है उसके बाद उनके हस्ताक्षर से ही सारे बिलों का भुगतान किया जाता है।
ऐसे में क्या निलंबित जैसी कार्यवाही की गाज निचले स्तर के ही कर्मचारियों पर क्यों गिराई जाती है, यहां विभाग के वरिष्ठ आला अधिकारियों डीजीएफ को संज्ञान में लेना चाहिए था। जिसमें ज्यादा जिम्मेदारी सीसीएफ भोपाल की बनती है क्योंकि विदिशा जिला भी इनके पास है, इनका यह कर्तव्य बनता है इतनी बड़ी योजना पर लाखों के बिल भुगतान करने में डीएफओ स्तर के अधिकारी के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है। निचले स्तर के कर्मचारियों की जगह एसडीओ एवं डीएफओ के मार्गदर्शन में हुए 18 लाख के भ्रष्टाचार के जिम्मेदार यह दोनों अधिकारी भी है।
सीसीएफ भोपाल को तुरंत इस मामले को अपने संज्ञान में लेकर एक टीम गठित कर इसकी बहुत ही बारीकी से जांच करानी चाहिए जिस समय इस योजना पर वृक्षारोपण किया जा रहा था एवं इस योजना के जितने भी बिलों का भुगतान हुआ होगा वह सारे डीएफओ के हस्ताक्षर से ही हुए होंगे जोकि जांच का विषय है इसकी जांच सीसीएफ भोपाल को करानी चाहिऐ दोषी पाए जाने पर डीएफओ को भी निलंबित करने की कार्यवाही करनी चाहिए।

सीसीएफ राजेश खरे
चीफ कंजरवेटर आफ फॉरेस्ट जिनके कार्यक्षेत्र में लटेरी वन मंडल भी आता है जब इस प्रकरण में चर्चा करने के लिए उनसे दो तीन बार भेंट करने का प्रयास किया तो कार्यालयीन समय में सीसीएफ कार्यालय में नहीं मिले. वही उनके मोबाइल पर भी संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. कार्यालय प्रांगण में कर्मचारियों द्वारा हंसते हुए यह जानकारी दी गई की गर्मी के दिनों में अमूमन साहब बंगले पर ही रहते हैं और अपनी सुविधा अनुसार ही कार्यालय आते हैं

डीएफओ ओंकार सिंह मर्सकोले
लटेरी डीएफओ ओंमकार सिंह मर्सकोले से बात करने पर उन्होंने स्वीकार किया है कि एक रेंजर एक डिप्टी रेंजर और दो नाकेदार को सस्पेंड किया गया है, यह कार्यवाही मुख्यालय स्तर पर डीएफओ की रिपोर्ट के बाद की गई है इससे स्पष्ट होता है कि डीएफओ लटेरी ने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ अदने अधिकारी एवं कर्मचारी को निशाना बनाकर शासन के साथ की गई धोखाधड़ी में जांच रिपोर्ट के नाम पर लीपापोती कर अपना पल्ला झाड़ा है यदि निष्पक्ष जांच की बात की जाए तो इस प्रकरण में तत्कालीन एसडीओ एवं तत्कालीन डीएफओ के विरुद्ध भी कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही की आवश्यकता है जो प्रदेश में नजीर बन सके और भविष्य में वरिष्ठ अधिकारी ना केवल शासन के साथ इस प्रकार की धोखाधड़ी करने से बचेंगे बल्कि मुख्यालय स्तर पर भी इस प्रकार के भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने की प्रथा पर भी विराम लगेगा।



