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दोस्ती के चलते मुगल-ए-आजम के गाने पर नहीं किया कॉपीराइट क्लेम, फाकामस्‍त शायर खामोश गाजीपुरी की दास्‍तां

अमितेश कुमार सिंह, गाजीपुर: मुहल्ला सट्टी मस्जिद में शायर खामोश गाजीपुरी (Khamosh Ghazipuri) का घर अब खंडहर में तब्दील हो गया है। इस घर में साल 1932 में 20 जुलाई के दिन वह पैदा हुए थे। खामोश का असली नाम मुज्‍जफर हुसैन था। वह अपने दौर के बेहद संवेदनशील शायर थे। कुछ साहित्यकारों ने उन्हें राही मासूम रजा से बेहतर शायर करार दिया है। उनके जीवन से जुड़े कई रोचक किस्से हैं। खामोश गाजीपुरी की एक आपबीती आज आपको बताते हैं।

खामोश गाजीपुरी के जीवन और उनसे जुड़े घटनाक्रम को बेहतर तरीके से जानने के क्रम में एनबीटी ऑनलाइन की टीम ने उनकी जीवनी पर काम करने वाले साहित्यकार ओबैदुर रहमान से संपर्क किया। साहित्यकार रहमान ने कई रोचक पहलुओं को साझा किया। खामोश गाजीपुरी मदरसा चश्माये रहमत में प्राइमरी सेक्शन में टीचर थे। इसके साथ शायरी का शौक उन्हें नई पहचान दे रहा था। एक दिन स्कूल की कमेटी ने खामोश को एक आदर्श टीचर की भूमिका में नही रहने का आरोप लगाया। उनके शराब आदि के सेवन पर तमाम सवाल उठे। परिणामस्वरूप उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद एक समय ऐसा भी आया जब उसी स्कूल परिसर में खामोश गाजीपुरी के लिए तमाम मुशायरों का आयोजन किया गया। आयोजन के पहले शराब की बोतलें खोली जातीं। शराब पीने के बाद नशे में मदहोश होकर खामोश गाजीपुरी अपने श्रोताओं को गजल और नज्म सुनाते थे।

मुगले आजम में बगैर बताए खामोश का गाना ले लिया, फिर…

वह युग साहिर, शकील, फैज, कैफी और मजरूह का था। मुगले आजम फिल्‍म के गाने को लेकर एक घटना हुई। फिल्‍म के गीतकार शकील बदायूंनी थे। उस फिल्म का एक गीत खामोश गाजीपुरी का था जो 1951 में दिल्ली की मशहूर पत्रिका ‘शमा’ के सितंबर अंक में छपा था। इस गजल को बिना क्रेडिट खामोश को दिए ही शकील ने फ़िल्म में इस्तेमाल कर लिया था। इस गीत के बोल कुछ ऐसे है।

हमें काश तुमसे मुहब्बत न होती
कहानी हमारी हकीकत न होती
न दिल तुम को देते न मजबूर होते
न दुनिया न दुनिया के दस्तूर होते
कयामत से पहले कयामत न होती
हमीं बढ़ गए इश्क़ में हद से आगे
ज़माने ने ठोकर लगाई तो जागे
अगर मर भी जाते तो हैरत न होती
तुम्हीं फूंक देते नशेमन हमारा
मुहब्बत पे अहसान होता तुम्हारा
जमाने से कोइ शिकायत न होती

नोटिस भेजने के पक्ष में नहीं थे खामोश पर दोस्‍तों ने भेज दिया


शकील बदायूंनी को खामोश के मित्रों वकील इशरत जाफरी साहब, भूरे बाबू, मौलवी फय्याज सिद्दीकी और उस्ताद चश्माये रहमत ने मिलकर एक नोटिस भेजी। शकील को भेजी नोटिस फ़िल्म में बिना खामोश के अनुमति के गीतों को प्रयोग करने से जुड़ा था। हालांकि खामोश नोटिस भेजने के हक में नही थे, लेकिन उन्हें बिना बताये ही शकील को नोटिस रजिस्टर्ड डाक से उनके दोस्तों ने भेजी थी। ओबैदुर रहमान के अनुसार, शकील साहब ने नोटिस मिलने के साथ ही मुंबई से 2 अपने आदमियों को खामोश के पास भेजा। जो खामोश साहब आकर मिले और एक बन्द लिफाफा दिया। उसमे अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए शकील ने लिखा था कि मेरी इज़्ज़त चाहे उछाल दो या बदनामी से बचा लो …. अब आपके हाथ मे है।”

शराब ज्‍यादा पीने की वजह से 49 साल की उम्र में हो गया इंतकाल

साहित्यकार रहमान के आगे बताया कि खामोश बहुत नेकदिल और सज्जन शायर थे। उन्हें पत्र के रूप में जवाब दिया कि ‘मैंने लाख मना किया था लेकिन चुपके से भेज दिया गया …. आप परेशान न हों’। शकील साहब ने 3500 रुपया भी खामोश को भेजा था। हालांकि यह रकम नोटिस के एवज में नहीं, बल्कि यह दोनों के बीच दोस्ती के दायरे की लेन-देन थी। महज 49 साल की उम्र में खामोश गाजीपुरी का अत्यधिक शराब के सेवन से 1981 में इंतकाल हो गया था।

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