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उत्तराखंड में यूनिफॉर्म सिविल कोड: 2.31 लाख सुझाव, 20 हजार लोगों से बातचीत, अब फाइनल ड्राफ्ट तैयार, जानिए क्या है खास?

देहरादून: उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को लेकर हलचल तेज हो गई है। उत्तराखंड चुनाव 2022 के बाद सत्ता में वापसी के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा तेज कर दी थी। पहली कैबिनेट की बैठक में प्रस्ताव पर मुहर लगी। इसके बाद रिटायर्ड जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए ड्राफ्ट कमिटी का गठन किया गया। कमिटी ने यूनिफॉर्म सिविल कोड के ड्राफ्ट को फाइनल रूप दे दिया है। 2 लाख 31 हजार सुझावों और 20 हजार लोगों से बातचीत के बाद ड्राफ्ट को फाइनल रूप दिया गया है। इस संबंध में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि राज्य के लोगों को किए गए वादे के अनुरूप यूनिफॉर्म सिविल का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए बनाई गई समिति ने अपना कार्य 30 जून को पूरा कर लिया है। देवभूमि उत्तराखंड में जल्द ही समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी।

प्रकाशन के लिए भेजा गया प्रारूप

समान नागरिक संहिता के प्रारूप को तैयार किए जाने के बाद प्रकाशन के लिए भेज दिया गया है। समिति ने देश में लागू पर्सनल लॉ का परीक्षण किया। देखा गया कि इनमें बदलाव की जरूरत है या फिर समान नागरिक संहिता लागू करने की आवश्यकता है। कमिटी ने इस मसले पर गहन मंथन की। 63 बैठकों का आयोजन किया गया। हर वर्ग की राय के लिए उप समिति का गठन किया गया। जस्टिस रंजना देसाई ने दावा किया है कि सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, विभिन्न धर्मों के जानकारों और संवैधानिक संस्थाओं की राय के आधार पर ड्राफ्ट को फाइनल रूप दिया गया है। प्रकाशन के बाद कमिटी की ओर से ड्राफ्ट सरकार को सौंप दिया जाएगा। इसके आधार पर सरकार उत्तराखंड में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर सकती है।

मुस्लिम देशों में लागू कानूनों की भी हुई समीक्षा

जस्टिस रंजना देसाई ने फाइनल ड्राफ्ट के संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि देश के कानून ही नहीं, मुस्लिम देशों में लागू पर्सनल लॉ से संबंधित मामलों की भी समीक्षा की गई। उनकी स्टडी की गई। तमाम लोागों और वर्गों के सुझावों, भावनाओं और बातचीत के आधार पर ड्राफ्ट को तैयार किया गया है। समान नागरिक संहिता के ड्राफ्ट को महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगजनों के हित को ध्यान में रखते तैयार किया गया है।

विशेषज्ञ समिति में शामिल सचिव अजय मिश्रा, सदस्य रिटायर्ड जस्टिस प्रमोद हकोली, मनु गौड़, रिटायर्ड आईएएस शत्रुघ्न सिंह और प्रो सुरेखा डंगवाल ने दावा किया कि समिति के प्रत्येक सदस्य की सहमति इस प्रारूप में समान रूप से शामिल है।

विवाह की आयु सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव

सूत्रों के अनुसार, कानून में सभी वर्गों की महिलाओं और बच्चों के हितों पर खासा जोर दिया गया है। प्रारूप में प्रस्ताव दिया गया है कि मुस्लिम महिलाओं को भी पैतृक संपत्ति में पुत्र के समान बराबरी का अधिकार मिले। अभी यह अधिकार उन्हें नहीं है। हिंदुओं में जिस प्रकार से गोद लिए गए बच्चों को उत्तराधिकारी माना जाता है, उसी प्रकार से मुस्लिम और पारसी में भी गोद लिए गए बच्चों को उत्तराधिकारी माना जाएगा। लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र को भी 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष करने के प्रस्ताव को भी इसमें शामिल किए जाने की चर्चा है।

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